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कविता.... भ्रूण हत्या
अनूप मिश्र भ्रूण हत्या ... बेटी कहती है मैं तन की एक हिस्सा मुझसे निकलता कई किस्सा| मैं जग की पहचान हूँ, एक नन्हीं सी जान हूँ.......2 माँ मैं तेरी ऋणी हूँ, शैतानों से चिड़ी हूँ| माँ मुझे कोख़ में न मारो, मेरा जीवन निवछावर सारो| मैं तुम्हारी कभी भी शान हूँ, एक नन्हीं सी जान हूँ.......2 माँ मुझे तुम बचा लो, भ्रूण हत्या पाप न चढ़ालो| मैं तेरा सेवा करुँगी, तेरे लिए सब कुछ सहूँगी| जग की शान हूँ, एक नन्हीं सी जान हूँ...... माँ कहती है ... बेटी मुझे जमाने का डर है, तेरी हत्या करने पर ही मेरा घर है| मैं विवश हूँ उन शैतानों से, डर है सभी मकानों से| मेरे लिए तू महान है, बेटी तू! एक नन्हीं सी जान है.......2 मुझे गम है तेरी मौत का, डर है तो सिर्फ़ मेरी सौत का| मेरे दिल में जो दर्द है, वह बहुत बड़ा है, सभी का दिल क्यों सड़ा है? तू मेरी ही शान है, बेटी तू ! एक नन्हीं सी जान है.......2 मैं शपथ यह लेती हूँ, दुनिया को सबक देती हूँ| बंद हुआ यह अब खेल, अब होगा दिलों का मेल| जब तक जग में तेरा मान है, बेटी तू ! एक...
कविता.... चुप
पूर्णिमा पांडेय वर्चुअल क्लास शिक्षक , बृहन्मुंबई महानगरपालिका शिक्षण विभाग , वर्चुअल क्लास स्टूडियो सिविक सेंटर , दस्तूरवाड़ी , दादर (पूर्व) मुंबई पुरस्कार- 1.महाराष्ट्र शासन द्वारा (आदर्श राज्य शिक्षक) पुरस्कार-2011 2.बृहन्मुंबई महानगरपालिका महापौर शिक्षक गौरव पुरस्कार-2008 3.कलागुरु पुरस्कार-2007 4.कृति संशोधन एवं नवोपक्रम शोध निबंध मुंबई जिला एवं महाराष्ट्र राज्य स्तर प्रथम पुरस्कार चुप .... देखते हम रहे मौन थे सब खड़े हाथ उनके जो तरुवर के तन पर पड़े उसकी आहें औ चीखें सुनी अनसुनी तुम भी चुप चल दिए हम भी चुप चल दिए । शूल सी हूक उठती हृदय में रही जब बिलखने लगी नन्हीं सी इक कली उसकी सिसकन और तड़पन सुनी-अनसुनी तुम भी चुप चल दिए हम भी चुप चल दिए । कूड़ा अपने घरों का नदी को दिया उसने अमृत दिया हमने विष भर दिया उसकी सिहरन और ठिठुरन सुनी अनसुनी तुम भी चुप चल दिए हम भी चुप चल दिए । इतने बरसों की प...
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