दक्षिण अफ्रीका द्वारा आयोजित अंतराष्ट्रीय व्याख्यान श्रृंखला...
दक्षिण अफ्रीका द्वारा आयोजित अंतराष्ट्रीय व्याख्यान श्रृंखला में लोकसंग्रह तथा लोकमंगल पर गंभीर सांस्कृतिक परिचर्चा
दक्षिण अफ्रीका की
क्वाजुलू नाटाल यूनिवर्सिटी दक्षिण अफ्रीका के द्वारा "अंतरराष्ट्रीय
व्याख्यान श्रृंखला "का आयोजन किया गया जिसके मुख्य समन्वयक तथा संयोजक वरिष्ठ
प्रोफेसर डॉ .लोकेश रामनाथ महाराज थे। डॉ .लोकेश महाराज हिंदी भाषा ,शिक्षा
,दर्शन एवं गांधी चिंतन के
क्षेत्र में एक स्वनामधन्य व्यक्तित्व हैं।वह सक्रिय रूप से संस्कृति संबंधी अनेक
कार्यों में सम्बद्ध हैं।दक्षिण अफ्रीका तथा भारत की संस्कृति की ठोस विरासत को
केंद्र में रखकर उन्होंने इस शृंखला का विषय रखा--"लोकसंस्कृति की उपादेयता:
वैश्विक परिप्रेक्ष्य ।" इस अंतरराष्ट्रीय आमंत्रित व्याख्यान श्रृंखला में
उन्होंने दि.वि. की वरिष्ठ एवं अनुभवी प्रोफेसर डॉ. माला मिश्र को बतौर विशिष्ट
वक्ता आमंत्रित किया। साथ ही दक्षिण अफ्रीका से डॉ.म्लामुली भी इसमें उपस्थित थे।
लोकेश महाराज ने अफ्रीका की" उबंटू संस्कृति "से समस्त श्रोताओं को परिचित कराया तथा उसके महत्वपूर्ण पक्षों पर प्रकाश डालते हुए उसकी समावेशी भूमिका से अवगत कराया।
डॉ. माला मिश्र ने
भारत की प्राचीन एवं शाश्वत मूल्यपरक संस्कृति के उपयोगी संस्कारों का उल्लेख
किया। उन्होंने भारत की विविधता में एकता का सौंदर्य रचने वाली सांस्कृतिक विरासत
को सहेजने की चर्चा की , साथ ही लोकसंस्कृतियों के वैभव का सोदाहरण उल्लेख करते हुए
ब्रज संस्कृति से सभी को अवगत कराया।ब्रज मंडल के रीति-रिवाज,गीत-संगीत,खान-पान,ब्रज भाषा
जीवन शैली ,प्रत्येक सकारात्मक पहलू को अपनी धारदार तथा
प्रभावपूर्ण भाषा शैली में इस प्रकार प्रवाहित किया कि एकाएक ब्रज की कृष्णमय
सांस्कृतिक झलकी ही साकार हो उठी। डॉ.माला मिश्र ने उबंटू तथा भारतीय संस्कृति की
उभयनिष्ठ समानताओं को उजागर करते हुए उनकी समानताओं के कारणों की तलाश का मुद्दा
उठाया तथा दोनों के समानधर्मी संस्कारों की चर्चा भी की।सभी श्रोताओं ने
उनके" ज्ञान सागर" के प्रवाह की मुक्त कंठ
से टिप्पणी कर प्रशंसा की।
इसके उपरांत करिकुलम
व एजूकेशन स्टडीज़ क्वाजुलू विश्वविद्यालय के डॉ. म्लामूली लाट्शवाओ ने पी.पी.टी . की आकर्षक प्रस्तुति के सहयोग से उबन्टू
का सांस्कृतिक अर्थ सपष्ट किया, उसके
महत्वपूर्ण सामाजिक उपकरणों को उजागर किया तथा उबंटू के सर्वसमावेशी गुणों को बड़ी
बारीकी से उभारा।
युवा आलोचक एवं
मीडिया विशेषज्ञ डॉ .राकेश कुमार दुबे ने भारतीय संस्कृति के मूल संस्कार वसुधैव
कुटुम्बकम के केंद्रीय विचार की स्थापना की और भोजपुरी अंचल के रीतिरिवाजों, लोकगीतों
,खान-पान ,भाषिक विशेषताओं के साथ -साथ
निममगिरी के आदिवासी क्षेत्र की लोकसंस्कृति के उदाहरणों द्वारा अपने वक्तव्य को
व्यावहारिकता की धार दी।
दक्षिण अफ्रीका तथा
भारत के साथ -साथ अन्य देशों की लोक संस्कृतियों की जीवनी शक्ति को वर्तमान
सन्दर्भों में किस प्रकार उपादेय एवं ग्राह्य बनाया जा सकता है। इस पर सार्थक
परिचर्चा एवं प्रतिभागियों के प्रश्नों के सटीक समाधान करने के पश्चात इस
"अंतरराष्ट्रीय शृंखला " के भावी स्वरूप पर
आयोजकों द्वारा गहन विचार विमर्श किया गया।डॉ .लोकेश महाराज ने आमंत्रित विशिष्ट
वक्ताओं के मूल विचारों को उद्धृत करते हुए औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन किया।
इस अंतरराष्ट्रीय व्याख्यान श्रृंखला का समापन सी.आर.पी. एफ. पब्लिक स्कूल ,रोहिणी ,दिल्ली की मेधावी एवं बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न छात्रा शुभांगी के सुंदर एवं भावप्रवण नृत्य से हुआ । उहोंने अपनी अभिराम नृत्य मुद्राओं एवं भाव भंगिमाओं के द्वारा वर्तमान कोरोनाकाल में दुःख एवं अवसाद को बाहर निकलने एवं सकारात्मक आस्थावादी दृष्टिकोण अपनाने का संदेश देकर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया जिसके लिए क्वाजुलू उबन्टू विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें ' क्वाजुलु उत्कृष्ट नृत्यांगना सम्मान' से अलंकृत किया गया।उन्होंने नृत्य को एक उपचारात्मक सकारात्मक माध्यम के रूप में उपादेय बनाकर लोकसंस्कृति की छाप को अमिट बना दिया।
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