कविता... पिता

कल्पना सिंह राठौर
शोधार्थी, भारतीय भाषा केंद्र,
जवाहरलाल नेहरु विश्विद्यालय, नई दिल्ली
 

पिता

पापा...

एक बात पूंछू...

सच सच बताओगे ?

एक बेटी का पिता होना कभी कभी तो खलता ही होगा |

जब जाना पड़ता होगा मेरे सुखद जीवन के लिए दूसरा घर तलाशने...

तो एक टीस तो उठती ही होगी न..

कि जाने मेरे कलेजे का टुकड़ा खुश भी रहेगा या नहीं |

इतने नाजों से पाला तुमने हमको...

कि कभी तेज धूप भी नहीं लगने दी...

हर सघन बारिश में तुम गहरा दरीचा बन गए...

हम सभी घर वालों के लिए |

जानती हूँ पापा कि हमारे आंसू पोंछते-पोंछते ...

तुम कभी खुल के रो भी नहीं पाए होगे |

जानती हूँ कि घर की रोटी-दाल जुगाड़ने में...

तुमने कई बार अपनी इच्छएं दबाई भी होंगी|

चुपचाप मार दी होगी अपनी हर छोटी-बड़ी चाहत |

पापा...

मैं ये जानती हूँ की अब से लेकर मेरे बिदा होने तक...

तुम एक भी रात चैन से नहीं सो पाओगे |

जानती हूँ की बेटी को ब्याहने में कोई कसर भी नहीं रखोगे...

जानती हूँ, मुस्कुराते हुए गर्दन तक कर्जे में डूब भी जाओगे...

और इस तरह से तुम अपना पिता-धर्म निभाओगे |

लेकिन मैं उस सैलाब का क्या करूँ जो मुझे भीतर ही भीतर तोड़ रहा है |

क्यूँ कोई पिता बेटी के साथ ‘कीमत’ भी देने को विवश होता है ?

कब कोई पिता अपनी बेटी के होने का जश्न मना पायेगा...?

कब कोई पिता लाडली के ब्याह से निश्चिन्त होकर सुकून से सो सकेगा...?

ओ मेरे सर्जक...

आखिर कब तुम मेरे होने का गुरूर महसूस कर पाओगे ?

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