कविता... 1.हाँ! मुझे पसंद नहीं 2.भिखारी....

निधि मानसिंह
गाँव कांधला, जिला मुजफ्फरनगर (उत्तर प्रदेश)


हाँ! मुझे पसंद नहीं...

मैं खुशी से तुम्हारे लिए

खाना बनाती हूँ।

बडे प्यार से तुम्हें खिलाती हूँ

पर तुम्हारी जूठी थाली उठाना।

मुझे पसंद नहीं।

बरसों से हम साथ हैं।

प्यार भी है, तकरार भी है।

पर,गैरों के सामने तुम्हारा डाँटना

मुझे पसंद नहीं।

तुम्हारे जूते चप्पल उठाना

तुम्हारा कपड़े इधर उधर फैलाना

मुझे पसंद नहीं।

बेग़ानो से फ़ोन पर

घंटो बातें करते हो।

मुझ से दो शब्द भी

प्यार के न बोलना

मुझे पसंद नहीं।

सास-ससुर की दिन-रात

सेवा करती हूँ।

मेरी माँ से फोन पर

बात करने पर।

तुम्हारा मुँह फुलाना

मुझे पसंद नहीं।

पूरा साल तुम्हारे साथ

निकल जाता है।

जब मायके जाने का

वक़्त आता है।

दो चार दिन में ही

लौट आना।

तुम्हारा ये कहना

मुझे पसंद नहीं।

सारा जीवन तुम्हारे साथ

बिता दिया

तुम्हारा सुख-दुःख में सदा

साथ दिया।

तुम्हारा मेरी ख़ामोशी को

न समझ पाना

मुझे पसंद नहीं।

तुम पर कोई बंधन नहीं

सब बंधन मेरे हैं।

तुम आधी रात को भी

घर आओ

पर मेरी हंसी को भी टोकना

मुझे पसंद नहीं।

सिंदूर तुम्हारा, बिंदिया तुम्हारी

जीवन की हर सांस तुम्हारी।

पर लाश पे कफ़न बाबुल का

मुझे पसंद नहीं।

मैंमाँ, पत्नी

और बेटी हूँ।

पर पहले मैं नारी हूँ।

अपने वजूद के साथ

समझौता

मुझे पसंद नहीं।


भिखारी.... 

दो बच्चे साथ लिये

हाथों में हाथ लिये।

सहमी आखों से देखे

कटोरा हाथ में लेके।

दर-बे-दर भटकता है

रात-रात भर जगता है।

फटे कपड़े जूती टूटी

हाय! रे उसकी किस्मत फूटी।

नभ के नीचे उसका बसेरा

फुटपाथ पर होता सवेरा।

धनवानों की बस्ती में जाके

भीख माँगे हाथ फैला के।

दौलत वाले नीयत से गरीब

वाह! री कुदरत वाह! रे नसीब।

दौलत की उनमें मारा मारी

वो तो मुझ से बड़े भिखारी।

बात समझ में गई सारी

में भी भिखारी, वो भी भिखारी।

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