आज से बढ़ने लगी है ठंढक...
जितेन्द्र सिंह
पीएचडी/एम फिल/ नेट, जे
आर एफ
गाँव- आलिंगुड़ बोलबा
सिमडेगा, झारखंड
आज से बढ़ने लगी है
ठंढक...
आज से बढ़ने लगी है
ठंढक
मन बहुत हर्षाया है
थोडी़ देर से ही सही
एक मौसम लौटकर आया
है
जब देश के पहाड़
खनन जाँच से गुजर
रहे हों
और जंगल,
बादलों को अपनी ओर
खिंचने में
असमर्थ हो रहे हों
ऐसे में
ठंढ का लौटना बडी़
बात है
मौसम अपनी रंगत में
बचा रहे
तो बीजों में
अँखुआने की उम्मीद बची रहेगी
और बचेगा एक रिश्ता
हल का जमीन के साथ
फूलों का तितलियों
के बीच
नदियों का अपने
किनारों के साथ
और कवि का अपनी
कविता के साथ
लेकिन जब आप
मौसम के अनुकूलन में
शामिल हों
तो कितनी देर
टिकेगी/यह जाडे़ की धूप !
शानदार कविता। कवि को बधाई।
जवाब देंहटाएंसुंदर रचना
जवाब देंहटाएंBahut sundar, congratulations
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