राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया...
अध्ययन एवं अनुसंधान पीठ की सार्थक पहल
‘स्वदेशी की राह पर सशक्त राष्ट्रनिर्माण’
दिनांक 15 जुलाई को "अध्ययन एवं अनुसंधान पीठ" के
द्वारा एक राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसका विषय था "राष्ट्र निर्माण और स्वदेशी: समकालीन
विमर्श"। इस राष्ट्रीय संगोष्ठी की मुख्य समन्वयक
एवं संयोजिका दिल्ली विश्वविद्यालय की वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. माला मिश्र थीं।
वर्तमान आपदाकाल एवं समसामयिक परिस्थितियों में सशक्त एवं सुदृढ़ राष्ट्र की
परिकल्पना को साकार करना समय की सबसे बड़ी जरूरत है और इसी परिप्रेक्ष्य में इस
संगोष्ठी में "स्वदेशी" को केंद्रित करते हुए विषय को चुनना बहुत सार्थक
प्रयास रहा।
इस
संगोष्ठी की अध्यक्षता
प्रोफेसर पी. एल. चतुर्वेदी(कुलाधिपति हरियाणा केंद्रीय
विश्वविद्यालय) ने की। विशेष अतिथियों के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर रामदेव भारद्वाज ,महात्मा
गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर रजनीश कुमार शुक्ल तथा गौतम
बुद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर भगवती प्रकाश शर्मा उपस्थित थे।
कुलपति
संगोष्ठी में सर्वप्रथम प्रोफ़ेसर भगवती प्रकाश शर्मा ,जो कि
एक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री भी हैं उन्होंने इस बात पर सबका ध्यान आकर्षित किया कि
उद्योग ,वाणिज्य ,व्यापार और
कृषि पर किसी भी एम.एन. सी का वर्चस्व खत्म किया जाना सबसे बड़ी जरूरत है।
उत्पादन के साधनों पर
नियंत्रण एवं स्वामित्व देश का होना चाहिए ,बाहर वालों का नहीं।
अन्यथा जिसका नियंत्रण होगा वही समाज तथा संस्कृति को प्रभावित
भी करेगा। उन्होंने तलाक व पुनर्विवाह की सोच को परंपरा या आदत बना लेने को सर्वथा
हानिप्रद बताया। स्वस्थ समाज ,परिवार या राष्ट्र निर्माण में
ऐसी आदतें या परंपराएं सदैव बाधक बनती हैं। उन्होंने आर्थिक तथा तकनीकी राष्ट्रवाद
के विकास के साथ आयातों के प्रतिस्थापन को भी स्वदेशी की स्थापना में आवश्यक बताया
।
आरोग्य भारती के उपाध्यक्ष एस. बी. दंगायच ने आयुष मंत्रालय के बीजवपन की मात्रा को प्रकाशित करते हुए आरोग्य भारती के सरकारों पर बखूबी चर्चा की। अपने सुदीर्घ कार्यानुभवों से कुछ कटु दृष्टांत प्रस्तुत करते हुए कुछ चिंताएं प्रकट की कि किस प्रकार भारतीय उपचार पद्धतियों कि देश में पूर्णतः अवहेलना हो रही है और प्रायः सभी सरकारें इस विषय में मौन रही हैं । भारतीय मूल्यधर्मी उपचार पद्धतियों की पर्याप्त प्राणमयस्वीकार्यता को सर्वथा अभाव स्वदेशी के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है वास्तव में हर सरकार को ब्यूरोक्रेट्स चलाते हैं और अंग्रेजियत उनके कण-कण में मौजूद है। उन्हीं के कारण आयुर्वेदिक तथा प्राकृतिक आदि उपचार पद्धतियों का पर्याप्त विस्तार,प्रसार एवं स्वीकार नहीं हो पा रहा है। एलोपैथी सिर्फ एक स्तर पर उपचार करती है जबकि आयुर्वेदिक उपचार पद्धति अन्नमय ,मनोमय ,प्रणमय ,आनन्दमय आदि अनेक स्तरों पर उपचार का प्रावधान करती है ।तन और मन दोनों के स्तर पर आरोग्य की संकल्पना को चरितार्थ करती है। संरक्षण स्वास्थ्य की परिपोषक है भारतीय उपचार पद्धतियाँ ।
आरोग्य भारती के उपाध्यक्ष एस. बी. दंगायच ने आयुष मंत्रालय के बीजवपन की मात्रा को प्रकाशित करते हुए आरोग्य भारती के सरकारों पर बखूबी चर्चा की। अपने सुदीर्घ कार्यानुभवों से कुछ कटु दृष्टांत प्रस्तुत करते हुए कुछ चिंताएं प्रकट की कि किस प्रकार भारतीय उपचार पद्धतियों कि देश में पूर्णतः अवहेलना हो रही है और प्रायः सभी सरकारें इस विषय में मौन रही हैं । भारतीय मूल्यधर्मी उपचार पद्धतियों की पर्याप्त प्राणमयस्वीकार्यता को सर्वथा अभाव स्वदेशी के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है वास्तव में हर सरकार को ब्यूरोक्रेट्स चलाते हैं और अंग्रेजियत उनके कण-कण में मौजूद है। उन्हीं के कारण आयुर्वेदिक तथा प्राकृतिक आदि उपचार पद्धतियों का पर्याप्त विस्तार,प्रसार एवं स्वीकार नहीं हो पा रहा है। एलोपैथी सिर्फ एक स्तर पर उपचार करती है जबकि आयुर्वेदिक उपचार पद्धति अन्नमय ,मनोमय ,प्रणमय ,आनन्दमय आदि अनेक स्तरों पर उपचार का प्रावधान करती है ।तन और मन दोनों के स्तर पर आरोग्य की संकल्पना को चरितार्थ करती है। संरक्षण स्वास्थ्य की परिपोषक है भारतीय उपचार पद्धतियाँ ।
केंद्रीय
हिंदी संस्थान के मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय, भारत
सरकार के उपाध्यक्ष श्री अनिल जोशी ने विदेशों में अपने व्यतीत कार्य काल में
व्यक्ति अनुभवों से भारतीय संस्कृति के विदेशों में व्याप्त प्रभाव से चर्चा का
प्रारंभ किया तथा स्वदेशी के माध्यम से सशक्त एवं
सुदृढ़ राष्ट्र निर्माण के लिए आत्म मंथन व आत्मा अनुसंसाधन को परम आवश्यक तत्व
बताया। बौद्धिक एवं भाषाई स्वाभिमान के द्वारा ही राष्ट्र के सशक्तिकरण को सम्भव
बनाने का मार्ग दिखलाया। उन्होंने कहा कि इसके अभाव में मात्र "श्मशान
वैराग्य" की सिद्धि ही हो सकती है और सम्पूर्ण प्रयास मात्र आँकड़े का ब्यौरा
ही रह जाएगा।
प्रो. रजनीश शुक्ल ने
कहा कि सर्वप्रथम हर भारतवासी की मानसिकता को बदलना अवश्यम्भावी है। भारतीय
उत्पादनों के प्रति स्वाभिमान और सम्मान की शिक्षा देना बहुत आवश्यक है। गांवों की
अधोसंरचनाएं तथा शिक्षा की अधोसंरचनाएँ परिवर्तित करनी होंगी, स्वदेशी समाज को विनिर्मित करनी होगी। अर्निंग विद लर्निंग
का अनूठा प्रयोग ही श्रेयस्कर हो सकता है। आत्मनिर्भरता और स्वदेशी का अर्थ विश्व
के अन्य देशों का आइसोलेशन कदापि नहीं है।
लक्ष्मी नारायण भाला ने
जयघोष कर कहा कि भारत भूमि में जन्म लेना परम सौभाग्य का विषय है। अपने कथन के
समर्थन में उन्होंने भारतीय संस्कृति से नाना उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अपनी बात
रखी । उन्होंने बतलाया कि हिन्द स्वराज आंदोलन स्वदेशी आंदोलन की कोख से ही जन्मा
है। उन्होंने मैकाले की अनुचित भाषा -नीति की आलोचना करते हुए उसे भारतीय भाषाओं को
कुचलने व अंग्रेजियत को जबरन थोपने का कुत्सित प्रयास करार दिया।भारत को
अंग्रेजियत से प्रभावित द्वीप नहीं बनने देना बल्कि हर तत्व का युगानुकुलन ,देशानुकूलन करना वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
अश्विनी महाजन ने निजी
उद्यम ,विकेंद्रीकरण, रोज़गार तथा कृषि
क्षेत्र की सशक्तता एवं युवाओं की आत्मनिर्भरता को श्रेष्ठ राष्ट्र की निर्मिति के
अनिवार्य तत्व बताया। उन्होंने अपनी चिर, प्रचलित सत्यान्वेषी, प्रखर शैली में जमीनी स्तर की राष्ट्रीय समस्याओं को उठाया और समकालीन
चुनौतियों के समाधान के कारगर उपायों को जीवंत दृष्टांतों के माध्यम से पुष्ट करते
हुए अपनी मौलिक विचार सरणि को विस्तार दिया।
डॉ. राकेश कुमार दुबे ने ओजस्वी स्वरों में खुला आह्वान किया कि इस संकटकाल के कालखण्ड का हनुमान बनने की चरम अपेक्षा है। जो संजीवनी बूटी रूपी समाधान लाएगा वही स्वदेशी के पथ पर सशक्त राष्ट्र का स्वप्न साकार करने का विजेता भी कहलाएगा। उन्होंने लघु एवं कुटीर उद्योग ,शिल्प ,कारीगरों के मुद्दे को सुनियोजित तरीके से उठाने और आदिवासी, दलितों तथा प्रवंचितों की प्रतिरोध संस्कृति पर चर्चा कर अनछुए पहलुओं पर सार्थक रूप में प्रकाश डालकर संगोष्ठी को सशक्त दिशा प्रदान की ।बाल मुकुंद पांडेय ने आत्मदीपो भव के संस्कार से वक्तव्य के ध्येय को प्रदीप्त किया।
डॉ. राकेश कुमार दुबे ने ओजस्वी स्वरों में खुला आह्वान किया कि इस संकटकाल के कालखण्ड का हनुमान बनने की चरम अपेक्षा है। जो संजीवनी बूटी रूपी समाधान लाएगा वही स्वदेशी के पथ पर सशक्त राष्ट्र का स्वप्न साकार करने का विजेता भी कहलाएगा। उन्होंने लघु एवं कुटीर उद्योग ,शिल्प ,कारीगरों के मुद्दे को सुनियोजित तरीके से उठाने और आदिवासी, दलितों तथा प्रवंचितों की प्रतिरोध संस्कृति पर चर्चा कर अनछुए पहलुओं पर सार्थक रूप में प्रकाश डालकर संगोष्ठी को सशक्त दिशा प्रदान की ।बाल मुकुंद पांडेय ने आत्मदीपो भव के संस्कार से वक्तव्य के ध्येय को प्रदीप्त किया।
शिवमंगल सिंह सुमन जैसे
राष्ट्रीय विचारधारा के व्यक्तियों की काव्य पंक्तियों के माध्यम से स्वदेशी के
उन्नयन का शंखनाद किया। डॉ. संदीप अवस्थी ने अपने जीवन के प्रेरक प्रंसगों तथा व्यावहारिक अनुभवों से स्वदेशी के प्रसार व राष्ट्र
निर्माण के कार्यों को गति प्रदान की। विश्व विख्यात हिंदी साहित्यकार तथा
अप्रवासी आलोचक डॉ .पुष्पिता अवस्थी ने सशक्त शैली व सुदृढ़ ललकार द्वारा भारतीयों
के मन: पटल को उद्वेलित करने वाले अंदाज में कथनी -करनी के अंतर को मिटाने की
प्रेरणा दी तथा क्रियान्वयन हेतु अधिकाधिक ईमानदार प्रयास करने का जज़्बा विकसित
करने की चेष्टा की अपने द्वारा इस दिशा में किये जा रहें विश्व स्तरीय प्रयासों की
सोदाहरण चर्चा की।
इसके उपरांत संवाद की
सार्थक परम्परा के उदाहरण रूप में
प्रश्नोत्तर सत्र ने प्रतिभागियों की समसामयिक चिंताओं व जिज्ञासाओं का परिशमन
करने का सार्थक मंच प्रदान कियाऔर संगोष्ठी की सरंचना को व्यवहारिक औचित्य से
समृद्ध किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन
प्रस्तुत करते हुए प्रोफेसर पी.एल.चतुर्वेदी ने भारतीय संस्कृति से परिचय कराते
हुए उसके सर्व समावेशी तत्वों की व्यवहारोचित विवृति की तथा वर्तमान परिदृश्य में
भारतीय जीवन मूल्यों एवं संस्कारों की पुनर्स्थापना को आवश्यक बताया ।समस्त
वक्ताओं को वक्ताओं की सारगर्भित प्रासंगिकता पर विचार किया तथा राष्ट्रीयसंगोष्ठी
की मुख्य समन्वयक एवं युवा व कर्मठ संयोजिका दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर डॉ.
माला मिश्र के अनवरत बौद्धिक प्रयासों की सह्रदयतापूर्वक सराहना की एवं उनके
द्वारा लगभग पांच महीनों से प्रारंभ की गई "विश्व संवाद श्रृंखला" के
विश्व व्यापी प्रसार एवं अछूते एवं समसामयिक विषयों पर सुंदर, व्यापक एवं गम्भीर आयोजनों की श्रृंखला बुनने पर शुभाशंसा
की।
अंत में समस्त प्रतिभागियों
एवं विद्वतवर्ग, अतिथियों एवं अध्यक्ष महोदय का
औपचारिक हार्दिक धन्यवाद ज्ञापन करते हुए संयोजिका डॉ. माला मिश्र ने भारतेंदु जी
की पंक्तियों द्वारा स्वदेशी के विचार का समर्थन एवं पल्लवन किया। "निज भाषा
उन्नति अहै,सब उन्नति को मूल"। अर्थात अपनी भाषा ,अपनी संस्कृति, अपने विचारों, अपने संस्कारों, अपने उत्पादों, अपने संसाधनों, अपनी सोच, अपनी
उद्यमशीलता और इन सबसे अधिक अपने आत्मविश्वास तथा आत्मबल द्वारा ही स्वयं को,
अपने समाज को, अपने राष्ट्र को स्वावलंबी, स्वदेशी, सशक्त, सुदृढ़ तथा
आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। स्व का अवलंब ही सम्मान तथा पहचान का मूल मंत्र
है। और यही संगोष्ठी का मूल विचार था।
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