जन्म हमारा गाँव


डॉ. हरेन्द्र सिंह असवाल 
एसोशिएट प्रोफेसर 
हिंदी विभाग, जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज


जन्म हमारा गाँव का। दिल्ली बन गया ठांव।
करोना के काल में, नहीं किसी को छाँव॥

गाँव जो छूटा छूट गया, सारा खेत खलियान। 
झोंपड़ियों में आ बसे, छोड़ के खुले मकान॥ 

पगडंडियाँ अब कहाँ वहाँ, सड़क गई अब गाँव। 
लोग वहाँ से निकल गये, खाली हो गये गाँव॥ 

जहाँ कहीं भी फ़सल है, गायों का गोठ्यार। 
केले पीपल आम का, वह जीवन सदा बहार॥ 

आम पके हैं पेड़ पर, नीचे गहरी छांव। 
खाट लगाये चौकसी, करे जमा के पाँव॥

गर्मी के इस मौसम में, बैठ पेड़ की छांव। 
छाकल में पानी भरे, गेहूँ  बीनने जांय॥ 

कोयल कूक रही डाली पर, कहे पुकार पुकार। 
कौआ चतुर सायाना, फिर भी धोखा खाय॥  

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