हिंदी कहानी....और शादी हो गयी


और शादी हो गयी
नूरूल इस्लाम
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शोधार्थी
उर्दू विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय,
नई दिल्ली- 110007

          बात उस ज़माने की है जब इन्सानों के भी पंख हुआ करते थे। इन्सान भी जानवरों की तरह ख़ानाबदोश ज़िंदगी बसर करते थे। खाने की तलाश में इन्सान एक जंगल से दूसरे जंगल भटकते रहते थे। किसी जगह पर ज़्यादा दिनों तक ठहरने का सीधा संबंध उस जगह मिलने वाली गज़ा से था।
          इन्हीं इन्सानों में दो ख़ास थे। एक का नाम वरा था दूसरे का नाम वीरू। दोनों बहुत ही ताक़तवर, बहादुर व हम दिल इन्सान थे। खाने की तलाश में इन दोनों को महारत हासिल थी। खाने के ऐतबार से अच्छी जगह के मिलते ही सभी लोगों को इकट्ठा कर मिल जुलकर खाने का ख़ूब आनन्द लेते थे। खाने की कमी महसूस होते ही सबसे पहले वह दोनों उस जगह को छोड़ते और एक नई दुनिया की खोज में निकल जाते। दरअसल यही उनकी दुनिया थी जिसमें इन्हें पेट भरने के सिवा कोई और कामन था। उनकी ज़िंदगी बहुत ही आज़ादी के साथ गुज़र रही थी।
          ठण्ड के दिनों की बात है, वीरू गज़ा की तलाश में निकला हुआ था। ख़ून जमा देनेवाली सर्दी में वीरू का ज्यादा देर तक परवाज़ कर नामुमकिन न था। इसलिये उसने सामने दिख रहे एक पहाड़ के पास उतरना ठीक समझा। ज़मीन पर उतरते ही वह दो छोटे पत्थरों को तलाश करने लगा जिनसे आग पैदा कर वह ख़ुद को गर्म कर सके। पत्थरों की टकराहट से वह चिंगारी पैदा करने की कोशिश कर ही रहा था कि पहाड़ में मौजूद गुफा से आवाज़ आई--- ऐ देव क़ामत इन्सान आग न जला गुफा के अन्दर आजा---।
वीरूः (हैरानी के साथ) आग क्यों न जलाऊँ? मुझे सर्दी लग रही है।
वीरू की बात सुनकर गुफा से कुछ लोगों की एक साथ हँसने की आवाज़ें आयीं इन्हीं लोगों में से किसी न आवाज़ लगाई--- हम तुम्हारे जैसे इन्सान ही हैं, गुफा के अंदर आजाओ यहाँ तुम्हें ठण्ड का एहसास छू कर भी नहीं जायेगा।
वीरूः (वीरू ने कुछ सोचते हुये सवाल किया) वह कैसे भला?
गुफा में से किसी बच्चे की आवाज़ आई--- यह कोई ऐसी वैसी गुफा नहीं है यह एक जादुई गुफा है। यह सर्दी के दिनों गरम और गर्मी के दिनों में ठण्डी रहती है। इस दौरान वीरू गुफाके नज़दीक आ चुका था उसने पत्थरों को फेंका और गुफा में दाखि़ल हो गया। गुफा में प्रवेश करते ही वीरू को ऐसा महसूस हुआ मानो वह किसी दूसरी दुनिया में आ गया हो। ठण्ड का एहसास, तुरन्त छूमन्तर हो गया। वीरू को बहुत अच्छा लग रहा था। गुफा में कुछ देर आराम करने के बाद वीरू ने उनलोगों से पूछा--- क्या इस इला़के में ऐसी ही कोई और गुफा है? इन्सानों ने नफी में सर हिलाया फिर भी एक औरत ने कहा--- हो भी सकती और हमें नामालूम हो। औरत की बात में एक दूसरी बात जोड़ते हुये एक बच्चे ने कहा--- अगर कोई और गुफा हमें मिल जाती तो हम इस गुफा को छोड़कर दूसरी गुफा में चले जाते। इस इलाक़े में गज़ा की कमीहै।
कुछ देर आराम करने के बाद वीरू ने उन लोगों से चलने की आज्ञा ली। वह उड़कर कुछ दूर ही गया था कि उसे फिर से सर्दी लगने लगी। उसे गुफा के शान्त, गुनगुने माहौल की याद आई। उसके मन में लालच ने दस्तक दी, गुफा में वापस न लौटने का उसके पास कोई तर्क न था। अब वह हवस के घोड़े पर सवार हो कर गुफा के पास पहुँचा। गुफा में रहने वाले इन्सानों ने उसे देखकर सोचा यह देव कदवाला आदमी वापस क्यों आ गया? इससे पहले वह कुछ और सोचपाते वीरू ने ऊँची आवाज़ में इन इन्सानों से कहा--- तुम लोग इस गुफा में बहुत रह लिये अब मैं इसकी गोद में आराम चाहता हूँ। एक वृद्ध महिला ने विरोद्ध किया उसके साथ बाक़ियों ने भी आवाज़ बुलन्द की गुन्डागर्दी, ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं चलेगी, नहीं चलेगी--- के नारे बुलन्द हुये। इतना सुनना ही था कि वीरू को गुस्सा आ गया। वीरू ने उनलोगों को दूध में गिरी मक्खी की तरह निकाल फेंका। वह बेचारे रोते-बिलख़्ते गुफा से जुदा हुये।
          वीरू अब अकेले इस गुफा में रहने लगा। कुछ दिनों के बाद जब ठण्ड कुछ कम हुयी वीरू खाने की खोज में गुफा से दूर जंगलो में निकल गया। उसे वापस लौटने में महीनों लग गये। वापस आ कर वह क्या देखता है कि उसकी प्रिय गुफा पर कुछ इन्सानों ने कब्ज़ा जमा रखा है। यूँ तो वीरू को उन्हें हटाने में ज़्यादा मेहनत न करनी पड़ी लेकिन वह यह बिलकुल नहीं चाहता था कि बगैर उसकी आज्ञा के कोई भी गुफा में रहे।
          वह इस मुद्दे को लेकर फिक्रमन्द रहने लगा। एक रात वह गुफा में आराम कर रहा था, तभी उसे एक तरकीब के साथ वरा की याद आयी। उसने सोचा कि--- अगर हम दोनों बारी-बारी से इस गुफा में रहें तो गुफा पर किसी के कब्ज़े का डर समाप्त हो जायेगा। यही सब बात सोचते-सोचते वह सो गया।
          सुबह होते ही वह वरा की तलाश में निकल पड़ा। कुछ दूर सफर करने के बाद उसने लोगों से वरा के बारे में पूछा। पूछने से उसे मालूम हुआ कि नदी के उस पार वरा लोगों के साथ खाने का लुत्फ ले रही है।
          नदी पार कर वीरू, वरा के पास पहुँचा। कुशल-मंगल के बाद वीरू ने जादुई गुफा के बारे में विस्तार से बताया, साथ ही अपनी मन्शा भी ज़ाहिर की। गुफा की ख़ुबियाँ सुन कर वरा को आश्चर्य हुआ, वह गुफा को देखने तुरन्त चल पड़ी। दोनों उड़ते हुए गुफा तक पहँचे। गुफा में प्रवेश करते ही वरा को यह एहसास हो गया कि वह किसी ख़ास जगह व माहौल में है। फलतः वीरू के सुझाव के अनुसार दोनों बारी-बारी से गुफा में रहने लगे।
          कुछ अरसे के बाद खाने की तलाश में वीरू उड़ते हुये जा रहा था। उसने ज़मीन पर देखा कि एक इन्सान को कुछ लोग दफना रहे हैं। वह उनके पास आया। उनलोगों से उस आदमी की मौत की वजह पूछी। एक बुर्जुग ने उपदेशात्मक लहजे में जवाब दिया--- बेचारा बुढ़ा हो गया था, मौत तो आनी ही थी सो आज ही आ गयी। इस दुनिया में जो भी आया है उसे जाना ही पडे़गा, आज उसका नम्बर था, कल हमारा होगा। बुढे़ आदमी की ऐसी बातों को सुनकर वीरू को कुछ अजीब सा महसूस हुआ लेकिन उसने ध्यान न दिया और अपनी राह चल पड़ा। रास्ते में उसे उस एहसास ने फिर से कचोटा, अब वह बेचैन हो गया, सामने नज़र आ रहे एक पेड़ के पास उतरा और बैठ गया। कुछ देर सोचने के बाद उसे मालूम हुआ कि उसके मरने के बाद उसकी गुफा का क्या होगा--- इस विचार ने उसे बार-बार परेशान कर रखा है। उदास हो कर वह पेड़ की छॉव में बैठा ही था कि उस पेड़ से एक आवाज़ आयी--- ऐ इन्सान तुम इतने उदास क्यों बैठे हो? इस आवाज़ को सुन कर वीरू सहम गया और उसने धीरे से पूछा-कौन---?
जादुई आवाज़-तुम अपने काम से मतलब रखो नाम में क्या रखा है, अपनी मायूसी की वजह बताओ।
वीरूःतुम क्या करोगे मेरी तकलीफ जान कर।
जादुई आवाज़ः(हंसते हुये) मैं सब कुछ कर सकता हूँ।
वीरूःअच्छा ऐसी बात है--- फिर तो तुम मुझे अमर कर दो। क्यों कि मुझे यही चिंता सताये जा रही है कि मैं एक दिन मर जाऊँगा और मेरी प्यारी गुफा पर लोगों का क़ब्ज़ा हो जायेगा।
जादुई आवाज़ः मैं ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि ऐसा करना व़फ़ुदरत के कानून में दख़ल अन्दाजी होगी। हर जानदार को मौत आनी है--- लेकिन एक रास्ता है जिससे तुम्हारी गुफा तुम्हारे पास हीर हेगी।
वीरू: वह कैसे?
जादुई आवाज़: तुम शादी कर लो।
वीरू: यह शादी क्या होती है?
जादुई आवाज़: शादी अर्थात विवाह-रिश्ते की एक पवित्र डोर है, इस डोर से कोई औरत किसी मर्द से बंध जाती है और उन दोनों के संबंध से जो बच्चा पैदा होता है वह इन दोनों के जिस्म का ही हिस्सा होता है अर्थात यह उन्हीं दोनों का ख़ून होता है। शादी के बाद तेरी बीबी के पेट से जो संतान पैदा होगी वही तुम्हारी गुफा की वारिस होगी।
वीरू: वह सब तो ठीक है लेकिन आप यह बतायें मुझे कैसे मालूम चलेगा यह जो बच्चा मेरी पत्नी ने जन्मा है मेरा ही है? आप तो जानते ही हो हम इन्सानों के पंख होते हैं, हमें खुली फिज़ा में उड़ना बेहद पसन्द है। औरत हो या मर्द दोनों को अपने खाने का खुद इन्तेज़ाम करना पड़ता है, जिसके कारण हम ख़ानाबदोशो का जीवन बसर करते हैं। मेरा क्या मैं तो मर्द हूँ लेकिन मेरी शादी जिस औरत से होगी उसको तो मेरा वारिस पैदा करना है। ऐजादुई आवाज़ आप मेरी बात समझ रहे हैं ना ---।
जादुई आवाज़ः ऐ फिक्रमन्द इन्सान--- तुम्हारी फिक्र दुरूस्त मालूम पड़ती है। मुझे ऐसा लगता है कि सारे फसाद की जड़ यह इन्सानों के पंख हैं, मैं ऐसा करता हूँ अपने जादू से आज ही, आधी रात सभी इन्सानों को नींद की ग़फलत में डाल, इनके पंख सिरेसे ग़ायब ही कर देता हूँ।
वीरूः (घबराकर) ऐसा न करें--- हम इंसान बेबस हो जायेंगे।
जादुई आवाज़ः मेरी बात पूरी नहीं हुई है--- तुम बहुत जल्दी घबरा जाते हो, पूरी बात तो सुनो।
वीरू: जी---
जादुई आवाज़: मैं इन परों की ताकत को इन्सानी दिमाग़ व बाजुओं में डाल दूँगा, जो इन्सान जितना चिंतन व मेहनत करेगा वह उतना ही दिमाग़दार व ताक़तवर होगा। लेकिन मैं ऐसा एक शर्त पर करूँगा।
वीरू: कौन सी शर्त पर?
जादुई आवाज़: वारिस की चाहत एक मर्द इन्सान ने की है इसलिये औरतों के खाने-पीने का इन्तेज़ाम मर्दों को ही करना होगा।
वीरूःजीमंज़ूर है।
जादुई आवाज़:  अब तो खुश हो जा मेरे फौलादी इन्सान।
वीरू: आप चाहे जो भी हों लेकिन आपका यह एहसान मैं जिंदगी भर नहीं भुलूँगा--- आपका बेहद शुक्रिया--- मैं अभी जा कर शादी करता हूँ।
वीरू रौशनी की रफ्तार से गुफा तक पहुँचा। वरा गुफा में न थी। कुछ देर बाद वह वापस आयी तो वीरू को गुफा के पास टहलते पाया।
वरा: इस बार बहुत जल्दी आ गये, क्या बात है? वीरू ने पंख ग़ायब हो जाने वाली बात को राज़ रखते हुये पूरी दास्तान ब्यान की---
वरा: इसमें कौन सी बड़ी बात है, हम वैसे भी कभी-कभी साथ रहते हैं शादी करके साथ रहने में क्या बुराई है, ऊपर से वादेके मुताबिक़ शादी के बाद मेरे खाने-पीने का इन्तेज़ाम भी तुम्ही करोगे।
वीरूःहाँ---  क्यों नहीं।
इस तरह बिना किसी ताख़ीर के शादी हो गयी।

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