कविता... देखो क्या वक्त आ गया है.



दीपाली कुजूर
पीएच-डी. शोधार्थी,
हिंदी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग,
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा  


देखो क्या वक्त आ गया है...

देखो क्या वक्त आ गया है
आज दशा और दिशा सब बदल गयी है।
ऐसा वक्त आ गया है कि
खुले आसमान में,
उड़ान भरना
अब मानो,
मुश्किल सा हो गया है।

अब तो,
ख्वाब सा लगे
हवाई-जहाजों में बेफ़िकर सफर करना,
दुनिया में मानो
ऐसा भय बन गया है।

भय से अब तो
सब तितर-बितर हैं
लोगों को अब तो एक-दूसरे को छूने से भी डर है।
देखो क्या वक्त आ गया है।

समय मानो
कहीं थम सा गया है
मन में अब बस
यही सवाल बन गया है,
कब-तक उबर पाएंगे हम इन हालात से
देखो क्या वक्त आ गया है।

टिप्पणियाँ

  1. वाह अच्छा है । इसीलिए वक़्त भी अच्छा है ।

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत खूब दीदी.. बधाई हो आपको

    जवाब देंहटाएं
  3. वाह...!!!
    बहुत ही सुंदर रचना....
    बधाई....💐

    जवाब देंहटाएं
  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

Popular

कविता.... भ्रूण हत्या

कविता.... चुप