ग़ज़ल...करे फ़रियाद कब तक हम





अतहर जमाल...
एम.एड. शिक्षाशास्त्र, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय 
हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र-442001 


करे फ़रियाद कब तक हमजो बोले भी तो बोले क्या।
भुलाकर सब गिले-शिक़वेये बाहें फिर से खोले क्या।।

सफ़र कटता नहीं तन्हाअज़ब सा हाल है दिल का।
ये दिल का बंद दरवाजाज़रा होले से खोले क्या॥

अज़ब सी बेकरारी हैतेरे बिन मेरी ऐ हमदम।
तेरी जुल्फों के साये मेंज़रा सर रख के रोले क्या॥

बहुत बैचेन है तुम बिनये आँखें कुछ नहीं कहती।
बहुत जागी है ये आँखें कहींमुँह ढक के सो ले क्या।।

जिसे हसरत हमारी हैहमें भी उसकी चाहत है।
ये राज़ - ए - ज़ुस्तज़ु अपनीकभी दुनिया से बोले क्या।।

टिप्पणियाँ

  1. पुरानी यादें ताज़ा हो गई भाई।।

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत खूब....हालांकि तुमसे सुनने की बात कुछ और ही है😍....यूँ ही लिखते रहो।

    जवाब देंहटाएं
  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  6. वाह क्या बात है!!! बहुत बढ़िया...

    जवाब देंहटाएं
  7. Bhut badhiya athar..... par tumhari awaz mein sunna jyada acha lagta hai

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत शुक्रिया, वो भी सुना देंगे जल्द ही ।

      हटाएं
  8. बहुत खूब, अद्भुत अथर भाई।

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

Popular

कविता.... भ्रूण हत्या

कविता.... चुप