कविता.... भ्रूण हत्या
अनूप
मिश्र
भ्रूण हत्या...
बेटी कहती है
मैं तन की एक हिस्सा
मुझसे निकलता कई
किस्सा|
मैं जग की पहचान हूँ,
एक नन्हीं सी जान
हूँ.......2
माँ मैं तेरी ऋणी हूँ,
शैतानों से चिड़ी हूँ|
माँ मुझे कोख़ में न
मारो,
मेरा जीवन निवछावर
सारो|
मैं तुम्हारी कभी भी
शान हूँ,
एक नन्हीं सी जान
हूँ.......2
माँ मुझे तुम बचा लो,
भ्रूण हत्या पाप न
चढ़ालो|
मैं तेरा सेवा करुँगी,
तेरे लिए सब कुछ सहूँगी|
जग की शान हूँ,
एक नन्हीं सी जान
हूँ......
माँ कहती है...
बेटी मुझे जमाने का डर
है,
तेरी हत्या करने पर ही
मेरा घर है|
मैं विवश हूँ उन शैतानों
से,
डर है सभी मकानों से|
मेरे लिए तू महान है,
बेटी तू! एक नन्हीं सी
जान है.......2
मुझे गम है तेरी मौत
का,
डर है तो सिर्फ़ मेरी
सौत का|
मेरे दिल में जो दर्द
है,
वह बहुत बड़ा है,
सभी का दिल क्यों सड़ा
है?
तू मेरी ही शान है,
बेटी तू ! एक नन्हीं सी
जान है.......2
मैं शपथ यह लेती हूँ,
दुनिया को सबक देती हूँ|
बंद हुआ यह अब खेल,
अब होगा दिलों का मेल|
जब तक जग में तेरा मान
है,
बेटी तू ! एक नन्हीं सी
जान है.......2
तुझे लड़ना है जमाने से,
रोना बंद कर,
अब तलवार ले खजाने से,
हर किसी से आगे बढ़ना,
किसी से कुछ नहीं सहना|
तेरा दिल ममता की खान
है,
बेटी तू! एक नन्हीं सी
जान हूँ.......2
दो जिस्म एक जान...
किला फतह करने चले थे,
पर कदम लडखडा गए,
बंसत में हुंकार भर, गले मिलाने चले
थे,
आँख फडफडा गए|
तुम्हारे अनुपम मिसाल
हुआ करते थे,
कहाँ गए वो दिन,
जो तुम दो जिस्म एक जान
हुआ करते थे...........2
वो चिलचिलाती धूप,
वो काली रातों का साया,
बस घूर-घूर के पूछे,
तुमने क्या-क्या पाया?
असल में जीवन का अर्थ समझ
नहीं पाए तुम,
मार्ग एकला चलो से बनता
है, कितनों को समझाए तुम
बेराग
में भी राग हुआ करते थे,
कहाँ गए वो दिन,
जो तुम दो जिस्म एक जान
हुआ करते थे...........2
जहाँ देखो तुम्हारी ही
चर्चा थी,
जब अपनी दोस्ती के
मिसाल की,
तुमने बांटी पर्चा थी,
अब जग-जाहिर हो गया,
तो क्यों डरते हो?
जमाना पूछ रहा
अनेक प्रकार से षड्यंत्र
क्यों करते हो?
उजाले उनकी यादों के
हुआ करते थे,
कहाँ गए वो दिन,
जो तुम दो जिस्म एक जान
हुआ करते थे...........2
मेरा कौम तेरा कौम...
जमीं पर चंद रह जायेंगे
बसर,
तो क्या करें?
ढूंढ़ता है यह कयामत कब
आ रहे हो पनाह में?
इतनी उल्फ़त में हैं
तेरे तेवर,
तो क्या करें?
तुमने इल्म कहाँ से
हासिल किया है?
कि बचाने वालों को
पीटना,
तुमने कैसे जुर्रत की
है?
हर दर्द को दूर
करनेवालों को थूकना|
ये न समझों की यह खुदा
नहीं है देखता,
कि कहाँ का गुस्सा कहाँ
पर तू है फेंकता?
ये अल्फ़ाज जेहन में
जरूर-जरूर रखना,
गर आवाम ही नहीं रहेगी
तो कौम का क्या करोगे?
दर बतर चीखें होंगी,
सन्नाटे होंगी, लाचारी होंगी,
हाँ रहेंगी तो सिर्फ
अकेलापन तो क्या भरोगे?
गर नहीं
रहेंगी जम्हूरियत,
तो किसको जड़ी बूटी
पिलाओगे,
तो क्या सिर्फ कौम-कौम
चिल्लाओगे?...................2
तुमने इन्तहा की हद कर
दी,
चंद रोज जो अच्छे थे
शहर उसमें जहर भर दी|
सवाल वाज़िब है!
इंसान से कौम है या कौम
से इंसान,
बवाल बाकी है कि कितनों
को तुम कर दिए परेशान|
ये ओछी सोच की कोई मरे,
तो क्या करें?
है नहीं कोई हमारा अज़ीज़,
तो क्या करें?
गर नहीं रहेगी सहूलियत,
तो किसको क्या खिलाओगे?
तो क्या सिर्फ कौम-कौम
चिल्लाओगे?...................2
कोरोना संकट...
तुम चाँद को पकड़ लिए,
चाहे इंसान से इंसान को
जकड़ दिए,
गर एहसास कुछ हो तो सारी
कौम में तुमने क्या-क्या कर दिए?
यह ख़ामोशी, ये मदहोशी,
ये बदहोशी,
ये चीख़-चीख़ पूछे,
तुम ही कल युग के मानव
हो,
हांयदि सच में मानव हो|
तो देखो! ये तुम्हारे बनाये
हुए आशियाने,
पलक झपकते निस्तनाबू द
हो रहे हैं ये ठिकाने|
बड़ी-बड़ी डींगे मारने
वाले हे! वसुधा के मानव,
क्या हुआ जो कोरोना बन
गया है दानव?
तनिक ठहरो! सोचो तनिक
याद करो,
वो अंहकार भरी कामयाबी,
वो अट्टहास भरी हंसी,
उस खुदा के सामने
तुम्हारी कदमें क्यों फंसी?
एक-एक करके इंसान ले
रहा खर्राटा है,
तो देख लो! शहर दर शहर
सन्नाटा है|.....................2
हाँ पूछो अपने उन जीवन
के अरमानों से,
हर चीख पर चीख निकल रहा
आसमानों से|
अमेरिका, ब्रिटेन,
इटली, चीन, फ्रांस, रशिया,
कुदरत के खर के आगे सब
के सब धाराशाई हो गये,
जो कहर से बचे वो अपनों
से रुसवाई हो गये|
कहींवेद, बाइबिल और
कुरान,
दंभ भरकर पूछ रहा इंसान|
अब चिल्लाओ ये मेरा
धर्म है ये तेरा है,
मासूमियत कहीं ओझल होकर
लगा रहा फेरा है|
यकीनन कहीं देर न हो
जाए,
गली दर गली कहीं साफ़ न
हो जाए|
गुस्ताखी माफ़ करो भगवान,
अनूप कहता,
इस दर्दनाक चीख से साफ़
करो आसमान|
एक-एक करके इंसानले रहा
कोरोना खर्राटा है,
तो देख लो! शहर दर शहर
सन्नाटा है|.....................2
आवाम की आवाज़...
आवाम को न समझे,
तो क्या समझे?
तुम्हारी राजनीति की
शुरुआत भी यही है,
अंत भी यही है|
धिक्कारती, दत्तकारती
आवाम,
मगर तुम्हें खाने को
पड़ी है जाम|
वंशवाद, परिवारवाद में
जकड़े लोगों,
तनिक ठहरों,
अनूप करता बुलंद आवाज़,
यकीनन तुम नहीं आओगे बाज|
जहाँ हुए बलिदान
मुखर्जी,
वो काश्मीर हमारा है,
इस आवाज़ को न समझे,
तो क्या समझे?......................2
याद करो तुम्हारी
तुष्टीकरण, दकियानूसी बातों को,
उन बेगुनाहों काश्मीरी
लाखों पर,
आज चैन से नहीं सो रहे
होंगे तुम रातों को|
तुम्हारी उस स्वतंत्रता
का पैर कतरना,
बस मोदी शाह को आता है,
ये जोड़ी हर
हिन्दुस्तानी को भाता है|
काश! आज भी तुम्हें जमुरियात
सेताल्लुकात होते,
तो तुम ऐसी भाषा न बोल
रहे होते|
कहीं ऐसा न हो
निस्तनाबुद हो जाओ तुम,
तुम्हारे फ़ैसले,
तुम्हारे खोखले वादे हो जायेंगे गुम|
काश्मीर से
कन्याकुमारी, भारत माता एक हमारी,
हिन्द की इस चीख को न
समझे,
तो क्या समझे?......................2
सरहदें हैं जमाने से...
यह मोर्चेबंदी,
हो रही किले बंदी|
सीमा को छोड़ों,
दिल मत तोड़ों|
सर्वत्र फ़ैल रहा असंतोष,
परमाणु से नहीं संतोष|
हमें मतलब है नजराने से,
सरहदें हैं जमाने से................2
खून के प्यासे बन रहे
हैं,
एक दूसरे से सन रहें
हैं|
समाप्त करो यह मार,
अच्छी तरह समझो सार|
हिंसा यदि इतना होगा,
विश्वधरातल में धँसा
होगा|
उसे मज़ा आता है डराने
से,
सरहदें हैं जमाने से...............2
शास्त्रों की होड़ लगी,
शांति की रास्ता छोड़
जगी|
मतवालें होते जा रहें
हैं|
वैमनस्य भावना आया,
मावनता को काट खाया,
हमें मतलब है कमाने से,
सरहदें हैं जमाने से.................2
सोचो जरा इसका प्रभाव,
बढ़ता मनुष्यता का अभाव|
रोक सको तो रोक लो,
जीवन का नया रूप दो|
इतना यदि प्रलय होता
रहा,
दुनिया देख यह सोता रहा|
हमें मतलब है हराने से,
सरहदें हैं जमाने से................2
हृदय स्पर्शी अनुपम कृति
जवाब देंहटाएंThank you so much
हटाएंVery nice 👌😊
जवाब देंहटाएंThanku dear
हटाएंGood
जवाब देंहटाएंबेहतर अभिव्यक्ति की हैं आपने इन कविताओं के माध्यम से|
जवाब देंहटाएंThanku so much dear friend
हटाएंFabulous
हटाएंBahut badhiya. Badhai ho.
जवाब देंहटाएंThanku so much
हटाएंBahut hi sundar rachana
जवाब देंहटाएंधन्यवाद मित्र
हटाएंजबरदस्त ।।
जवाब देंहटाएंमार्मिक कविता
Thanks dear friend
हटाएंबहुत सुंदर रचना है। बधाई हो 😊💐
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत धन्यवाद मित्र
हटाएंविभिन्न प्रासंगिक ज्वलंत मुद्दों पर टिकी हुई कविता यथार्थ का बोध कराती है। इसमें कवि की आत्मबोधता सन्निहित है।
जवाब देंहटाएंबधाई हो💐
Thanks dear........❤️
हटाएंविभिन्न प्रासंगिक ज्वलंत मुद्दों पर टिकी हुई कविता यथार्थ का बोध कराती है। इसमें कवि की आत्मबोधता सन्निहित है।
जवाब देंहटाएंबधाई हो
Bahut sundae
जवाब देंहटाएंBahut bahut dhanyvaad
हटाएंबहुत ही बेहतरीन
जवाब देंहटाएंThanku
हटाएंअतिसुन्दर कविता हैं
जवाब देंहटाएंBahut bahut dhanyvaad
हटाएंI am very happy to see you using this platform for expressing your creative thoughts. Keep it up dear Anup
जवाब देंहटाएंThanku so much dear maim.....
हटाएंIs a very beautiful and relevant formation....NYC ..
जवाब देंहटाएंThanku Om
हटाएंApki kavita bot hi shandar hai.. ek achi sikh logo tak pahuncha rahi h. Keep it up👍
जवाब देंहटाएंBahut bahut dhanyvaad aarushi
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